बिहार में NDA ने 243 सीटों वाली विधानसभा में 202 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। BJP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसके खाते में 89 सीटें आईं, जबकि सहयोगी JD(U) को 85, LJP(RV) को 19, HAM को 5 और RLM को 4 सीटें मिलीं। महागठबंधन महज 35 सीटों पर सिमट गया, जिसमें RJD 25, कांग्रेस 6 और वामदल कुछ सीटें ही बचा पाए। AIMIM ने भी 5 सीटें जीतीं। लेकिन जीत की इस खुशी के बीच दिल्ली से पटना तक एक सवाल गूंज रहा है कि क्या BJP अब नीतीश कुमार और JD(U) के बिना सरकार बनाने का रास्ता अपनाएगी?
हालात पर नजर डालें तो सत्ता तक पहुँचने के कई रास्ते हैं, लेकिन तीन विकल्प ऐसे हैं जिनकी सफलता की संभावना सबसे ज्यादा मानी जा रही है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बीएसपी और आईआईपी का रुख बीजेपी के पक्ष में होने की संभावना पहले से ही मजबूत है, क्योंकि पिछले चुनाव में भी बीएसपी का एकमात्र विधायक सत्ता पक्ष के साथ चला गया था।
पहला विकल्प लेफ्ट और AIMIM में सेंध लगाने का है, लेकिन यह अभी लगभग असंभव दिखता है। लेफ्ट अपने सिद्धांतों पर अडिग रहती है और AIMIM भी इस बार आसानी से टूटने की स्थिति में नहीं दिखती। हालांकि छोटी पार्टियों के विधायक पाला बदलें,यह राजनीति में यह आम बात है, लेकिन फिलहाल यह रास्ता कमजोर लगता है।
दूसरा विकल्प कांग्रेस के 6 विधायकों को लेकर है। यह छोटा दल है, इसलिए अंदरूनी टूट या इस्तीफे दिलवाना अपेक्षाकृत आसान दिखता है।
तीसरा और अधिक प्रभावी विकल्प जेडीयू व आरजेडी के कुछ विधायकों के इस्तीफों के जरिए विधानसभा की कुल संख्या घटाने का है। इससे बहुमत का जादुई आंकड़ा 122 से नीचे आ जाएगा और सरकार बनाने का रास्ता काफी सरल हो सकता है। महाराष्ट्र में इसी फॉर्मूले की सफल मिसाल मौजूद है।
कुल मिलाकर दूसरा और तीसरा विकल्प सबसे सफल साबित हो सकते हैं। लेकिन पेच यह है कि केंद्र की सरकार जेडीयू के समर्थन पर टिकी है, इसलिए फिलहाल बीजेपी खुलकर कोई बड़ा कदम न उठाए। हाँ, नीतीश कुमार पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति जरूर तेज रखी जाएगी। बस यह याद रखना होगा कि महाराष्ट्र में 2019 के चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला था, फिर भी शिवसेना और एनसीपी के दो गुटों के सहारे सत्ता का खेल सफलतापूर्वक चला लिया गया। मध्य प्रदेश में भी 2018 में बहुमत न होने के बावजूद साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति ने सरकार का रास्ता साफ कर दिया। यह भी सच है कि जब केंद्र में कांग्रेस की हुकूमत थी, तब वह इस राजनीतिक शतरंज की सबसे दक्ष खिलाड़ी मानी जाती थी। और मुमकिन है कि बीजेपी ने भी सत्ता की यह कला कांग्रेस से ही सीखी हो।