सिटी पोस्ट लाइव
झारखंड की राजधानी रांची में उस समय सनसनी फैल गई, जब एयरपोर्ट थाना पुलिस की एक टीम अचानक प्रवर्तन निदेशालय (ED) के क्षेत्रीय कार्यालय जा पहुंची। केंद्रीय जांच एजेंसी के दफ्तर में राज्य पुलिस की इस दस्तक ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है, बल्कि राज्य की सियासत में भी उबाल ला दिया है। बीजेपी ने इस कार्रवाई को हेमंत सरकार की ‘बदले की राजनीति’ करार देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, यह पूरी कार्रवाई एक मारपीट के आरोप से जुड़ी है। बताया जा रहा है कि दो दिन पहले ईडी के दो अधिकारियों—प्रतीक और शुभम—ने पेयजल विभाग के एक कर्मी संतोष कुमार से किसी मामले में पूछताछ की थी। संतोष कुमार का आरोप है कि पूछताछ के दौरान अधिकारियों ने उसके साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार किया। इस शिकायत के आधार पर रांची के एयरपोर्ट थाना में मामला दर्ज किया गया और इसी की जांच के लिए पुलिस की टीम ईडी कार्यालय पहुंची थी।
बीजेपी का बड़ा हमला: साक्ष्यों को नष्ट करने की साजिश?
इस छापेमारी के बाद झारखंड बीजेपी के बड़े नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर अपनी गहरी चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि ईडी कार्यालय में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारियों से जुड़े हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद हैं। मरांडी ने आशंका जताई कि पुलिस कार्रवाई की आड़ में इन डिजिटल और भौतिक सबूतों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है या उन्हें नष्ट करने का प्रयास किया जा सकता है।
‘जांच एजेंसियों को डराने की कोशिश’
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने इस कार्रवाई को असंवैधानिक बताया है। उन्होंने कहा कि चूँकि मुख्यमंत्री खुद ईडी के मामलों में जेल जा चुके हैं और उनके कई करीबी मंत्री व विधायक वर्तमान में मनी लॉन्ड्रिंग के रडार पर हैं, इसलिए सरकार बदले की भावना से काम कर रही है। शाहदेव ने चेतावनी दी कि एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था के कामकाज में इस तरह का हस्तक्षेप राज्य और केंद्र के संबंधों के लिए घातक साबित हो सकता है।
झामुमो का पलटवार और पुलिस का पक्ष
दूसरी ओर, सत्ताधारी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि कानून सबके लिए बराबर है। पुलिस का कहना है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो दर्ज प्राथमिकी (FIR) के आधार पर की गई है। पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि मारपीट की शिकायत की सत्यता जांचने के लिए मौका-ए-वारदात का निरीक्षण और पूछताछ अनिवार्य है।
ईडी और राज्य पुलिस के बीच का यह टकराव झारखंड में आने वाले दिनों में एक बड़े संवैधानिक संकट का रूप ले सकता है। जहाँ बीजेपी इसे भ्रष्टाचार छिपाने की कोशिश बता रही है, वहीं राज्य प्रशासन इसे कानून की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा मान रहा है। अब देखना यह होगा कि ईडी इस पुलिसिया हस्तक्षेप पर दिल्ली मुख्यालय या अदालत के माध्यम से क्या रुख अपनाती है।