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सहरसा। जब होली का नाम आता है, तो ज्यादातर लोग बरसाना और नंदगांव की लठमार होली के बारे में जानते हैं। लेकिन बिहार के सहरसा जिले के बनगांव में मनाई जाने वाली “घुमौर होली” एक ऐसी परंपरा है, जो प्रेम, सौहार्द्र और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण पेश करती है। यह कोई आम होली नहीं, बल्कि 19वीं शताब्दी से चली आ रही एक अनूठी परंपरा है, जहां हजारों लोग जात-पात और धर्म की दीवारों को तोड़कर एक साथ रंगों में सराबोर होते हैं।

होली की अनोखी परंपरा
बनगांव में होली मिथिला पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के अंतिम दिन, यानी एक दिन पहले मनाई जाती है, जिसे “फगुआ” कहा जाता है। जबकि अन्य जगहों पर चैत मास में खेली जाने वाली होली को “चैतावर होली” कहा जाता है। इस परंपरा की शुरुआत संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने की थी, और तब से लेकर आज तक यह उसी उत्साह के साथ मनाई जाती है।

भाईचारे की मिसाल
इस अनूठी होली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर भाग लेते हैं। रंगों से सराबोर यह आयोजन पूरे देश को प्रेम और एकता का संदेश देता है। यहां कोई भेदभाव नहीं, कोई ऊंच-नीच नहीं, सिर्फ रंग, उमंग और मस्ती है।
कैसे खेली जाती है यह होली?
- सुबह नौ बजे से गांव के लोग भगवती मंदिर में इकट्ठा होने लगते हैं।
- फिर शाम चार बजे तक गांव के अलग-अलग टोलों की टोली रंगों की धूम मचाती है।
- लोग एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर, लिपटकर और उठा-पटक करके होली खेलते हैं, जिसे “घुमौर होली” कहा जाता है।
- रंग, गुलाल और पानी की बौछारों के बीच हर कोई इस पर्व का भरपूर आनंद उठाता है।

हर वर्ग के लोग होते हैं शामिल
यहां सिर्फ ग्रामीण लोग ही नहीं, बल्कि सांसद, विधायक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, IAS, IPS जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग भी इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं। बनगांव में करीब 40 हजार ब्राह्मणों की आबादी है, लेकिन इसके बावजूद यह गांव सामाजिक सौहार्द्र की मिसाल कायम करता है।
प्रेरणा देता है बनगांव का यह आयोजन
आज जब समाज में विभाजन की बातें होती हैं, तब बनगांव की यह होली एक प्रेरणादायक संदेश देती है कि प्रेम, भाईचारा और समानता ही हमारी असली पहचान है। यह उत्सव सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि सौहार्द्र, समरसता और भारत की सांस्कृतिक एकता का भी उत्सव है।