तेज प्रताप यादव की राजनीति: ‘क्रांति’ का नारा, पर ‘भ्रांति’ क्यों? बिहार के इस कन्फ्यूजन क्रिएटर की सियासी दिशा

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव बिहार की राजनीति में हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। अपने बयानों, धार्मिक आयोजनों में भागीदारी और अनोखे अंदाज़ के कारण वह सुर्खियों में रहते हैं। हालांकि, हाल के दिनों में उनकी स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा ‘कन्फ्यूजन’ यानी भ्रांति का पर्याय बन गई है। जनता, समर्थक और राजनीतिक विश्लेषक—कोई नहीं समझ पा रहा है कि तेज प्रताप वास्तव में किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। एक तरफ वे ‘क्रांति’ लाने की बातें करते हैं, तो दूसरी तरफ उनके विरोधियों के सुर में सुर मिलाने वाले एक्शन से भ्रांति पैदा हो जाती है।

तेज प्रताप यादव की राजनीतिक दिशा क्यों सवालों के घेरे में है:

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‘जय सियाराम’ का नारा और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल
तेज प्रताप यादव ने हाल ही में एक सभा में “जय सियाराम” का नारा लगाकर सबको चौंका दिया था। यह नारा आरजेडी की पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) राजनीति से एकदम अलग था, जो मुख्य रूप से MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर आधारित है। इस कदम ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या वे बीजेपी-आरएसएस की भाषा बोलने लगे हैं? या क्या यह केवल लोगों को अपनी तरफ खींचने का एक तरीका है? इस धार्मिक नारे का इस्तेमाल उनकी राजनीतिक निष्ठा और भविष्य के रुख पर गहरा भ्रम पैदा करता है, खासकर जब वह धर्मनिरपेक्ष राजनीति के केंद्र में रहे लालू परिवार से आते हैं।

पार्टी चिन्ह पर असमंजस: साइकिल से ब्लैक बोर्ड तक
अपनी नई पार्टी ‘जनशक्ति जनता दल’ बनाने के बाद तेज प्रताप यादव ने पार्टी चिन्ह को लेकर बार-बार बयान बदलकर समर्थकों और सहयोगियों को भारी कन्फ्यूजन में डाल दिया। पहले उन्होंने ‘साइकिल’ का जिक्र किया, फिर ‘हाथी’ और अंततः उनका चुनाव चिन्ह ‘ब्लैक बोर्ड’ सामने आया। चुनाव चिन्ह को लेकर बार-बार बदलाव से यह संदेश गया कि पार्टी बिना किसी स्पष्ट योजना के काम कर रही है। ‘ब्लैक बोर्ड’ का चिन्ह सामने आने पर यह भी चर्चा हुई कि यह प्रशांत किशोर के संगठन ‘जन सुराज’ के चिन्ह ‘स्कूल का बस्ता’ के करीब लगता है, जिससे उनकी राजनीतिक मंशा पर और अधिक भ्रम गहराया।

तेजस्वी पर अस्पष्ट रुख: भाई का विरोध या दबाव की रणनीति?
छोटे भाई और आरजेडी के प्रमुख चेहरे तेजस्वी यादव को लेकर तेज प्रताप का रवैया सबसे बड़ा कन्फ्यूजन क्रिएटर रहा है। कभी वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि “तेजस्वी ही भविष्य हैं,” तो कभी वह भाई की राजनीति पर सवाल उठाते हैं। हाल ही में उन्होंने तेजस्वी के विधानसभा क्षेत्र राघोपुर का दौरा किया और वहां जाकर सवाल उठाए। उनके बयानों में यह स्पष्टता नहीं दिखती कि वे वास्तव में तेजस्वी का विरोध करना चाहते हैं, या फिर यह परिवार और पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है, ताकि उन्हें राजनीति में अधिक महत्व मिले।

‘क्रांति’ की बातें पर ठोस एजेंडे का अभाव
तेज प्रताप यादव लगातार यह दावा करते हैं कि वे बिहार में ‘क्रांति’ लाने और युवाओं को नई दिशा देने के लिए निकले हैं। वे रोजगार, शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बात करते हैं, लेकिन उनकी ‘क्रांति’ का ठोस रोडमैप या ब्लूप्रिंट कहीं दिखाई नहीं देता। केवल भावनात्मक ‘क्रांति’ का नारा देना जनता को आकर्षित करने में सफल नहीं हो पा रहा है, बल्कि यह सवाल उठा रहा है कि अगर वह सच में बिहार बदलना चाहते हैं, तो उनकी पार्टी का ठोस एजेंडा क्या है। क्रांति की बातें तो हैं, पर जमीन पर उतरने की कोई स्पष्ट योजना नहीं है।

संगठन और सहयोगियों के साथ अस्थिरता
एक राजनीतिक दल चलाने के लिए मजबूत संगठन और विश्वसनीय सहयोगियों की आवश्यकता होती है, लेकिन तेज प्रताप का रुख यहां भी अस्थिर रहा है। वे लगातार नए सहयोगियों को जोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन पुराने भरोसेमंद साथियों से उनका विवाद हो जाता है। हाल ही में उनके कई करीबी माने जाने वाले नेताओं ने उनसे किनारा कर लिया, क्योंकि उन्हें नेतृत्व और राजनीतिक दिशा दोनों पर भरोसा नहीं था। इसके विपरीत, वह उन नेताओं के करीब होते दिखे जो पहले आरजेडी और तेजस्वी यादव के करीबी रहे हैं। इस संगठनात्मक असमंजस से यह संदेश जाता है कि तेज प्रताप अपनी राजनीतिक रणनीति को लेकर खुद ही स्पष्ट नहीं हैं।

तेज प्रताप यादव की राजनीतिक पारी, इसलिए ‘क्रांति’ से ज्यादा ‘भ्रांति’ पैदा करती दिख रही है, और आने वाले विधानसभा चुनावों में यह ‘भ्रम’ मतदाताओं के निर्णय को कैसे प्रभावित करेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

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