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अमेरिका ने ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिससे भारत की इस बंदरगाह को विकसित करने की परियोजना पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रमुख उप प्रवक्ता थॉमस पिगॉट ने हाल ही में एक बयान जारी कर कहा कि चाबहार बंदरगाह का संचालन करने वाले लोगों पर इस महीने के अंत से प्रतिबंध लागू होंगे। यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की “ईरानी शासन को अलग-थलग करने के लिए अधिकतम दबाव डालने” की नीति के अनुरूप है।
29 सितंबर से लागू होंगे प्रतिबंध
अमेरिकी विदेश विभाग ने बताया कि 29 सितंबर, 2025 से चाबहार बंदरगाह से जुड़ी प्रतिबंधों में छूट को खत्म कर दिया जाएगा। 2018 में यह छूट विशेष रूप से अफगानिस्तान को मानवीय सहायता और आर्थिक विकास के लिए दी गई थी। इस नए आदेश के बाद, जो भी व्यक्ति या संस्था चाबहार बंदरगाह का संचालन करती है या उससे जुड़ी गतिविधियों में शामिल है, वह अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकती है।
भारत पर क्या होगा प्रभाव?
अमेरिकी प्रशासन के इस निर्णय से भारत सीधे तौर पर प्रभावित होगा, क्योंकि भारत इस रणनीतिक बंदरगाह के विकास में एक प्रमुख साझेदार है। भारत ने 13 मई, 2024 को चाबहार बंदरगाह के संचालन के लिए 10 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे। भारत के लिए यह बंदरगाह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है, जो पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए व्यापारिक मार्ग खोलता है।
भारत ने पहली बार 2003 में इस बंदरगाह के विकास का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) नामक एक विशाल सड़क और रेल परियोजना को साकार करना है। लगभग 7,200 किलोमीटर लंबा यह गलियारा भारत, ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए प्रस्तावित है। हालांकि, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगाए गए पिछले अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस परियोजना की गति काफी धीमी रही थी।
अब तक क्या-क्या हुआ?
अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट मिलने के बाद भारत ने चाबहार बंदरगाह का उपयोग करना शुरू कर दिया था। 2023 में भारत ने इसी बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान को 20,000 टन गेहूं की मानवीय सहायता भेजी थी। इसके अलावा, 2021 में ईरान को पर्यावरण के अनुकूल कीटनाशकों की आपूर्ति भी इसी रास्ते से की गई थी। हालांकि, अब अमेरिका का यह कदम भारत के प्रयासों पर एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। यह देखना बाकी है कि भारत सरकार इस स्थिति से कैसे निपटेगी और क्या अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस मुद्दे का कोई हल निकाला जाएगा।