अपने इतिहास को दोहरा रहा है बिहार , राजनीति और अपराध के गहरे रिश्ते.

City Post Live

सिटी पोस्ट लाइव :पटना के प्रतिष्ठित अस्पताल पारस के अंदर घुसकर एक दुर्दांत अपराधी चन्दन मिश्र को गोलियों से छलनी कर दिया गया.इस शूट आउट की वारदात ने सुशासन की धज्जी उड़ा दी है.अस्पताल में घुस कर मारने की ये पहली घटना नहीं है. यह बृजबिहारी प्रसाद की हत्या की याद दिलाती है. तब लालू यादव की सरकार थी और बृजबिहारी प्रसाद मंत्री. लग रहा जैसे बिहार अपने इतिहास को दोहरा रहा है. 13 जून 1998 के दिन बृजबिहारी प्रसाद IGIMS में टहल रहे थे जब एक एम्बेसेडर कार से उतरे अपराधियों ने एके-47 की मैगजीन उन पर खाली कर दी. उनके बॉडीगार्ड और दो अन्य भी मारे गए. उस हत्याकांड के पीछे बदले की आग थी. छोटन शुक्ला की हत्या का बदला. क्या चंदन मिश्रा की हत्या भी किसी गैंग राइवलरी का हिस्सा है? नाम तो शेरू गैंग का लिया जा रहा है. चंदन पर दर्जनों हत्या के मामले थे.

गोपाल खेमका मर्डर के बाद बुलडोजर और बुलेट की धमकी नेताओं ने दी. लेकिन अपराधियों के मनोबल पर कोई असर नहीं पड़ा. अपराधियों से निबटने की बड़ी तैयारी के पुलिस के ऐलान के दूसरे तीसरे दिन ही अपराधियों ने अस्मेंपताल में घुसकर शूट आउट की वारदात को अंजाम दे दिया.गोपाल खेमका की हत्या के बाद पुलिस की घेराबंदी करने की बजाय नीतीश कुमार के मंत्रियों ने कहना शुरू किया कि संगठित अपराध नहीं है .विपक्ष इसमें शामिल हो सकता है. क्या ये घटनाएं बिहार की राजनीति और अपराध के गहरे रिश्ते को दिखाती हैं? 1994 में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की हत्या, छोटन शुक्ला की मौत, और फिर भुटकुन और बृजबिहारी की कहानी. तबके सुशासन बाबू के कारण अनंत सिंह , सूरजभान, राजन तिवारी का अपराध से राजनीति में सुनियोजित संक्रमण. ये सब बिहार ने देखा है.

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बृजबिहारी प्रसाद मुजफ्फरपुर के ओबीसी चेहरा थे लेकिन दबदबा भूमिहारों का था. नेता कांग्रेस के रघुनाथ पांडे और संरक्षण दुर्दांत छोटन शुक्ला को. दोनों की जोड़ी मुजफ्फरपुर में राज करती थी. लालू यादव के सत्ता में आने के बाद वर्चस्व दांव पर था. भूरा बाल साफ करो वाली पॉलिटिक्स चल रही थी. अगड़ों की राजनीति को अंगड़ाई दी. आनंद मोहन ने. उनकी बीवी ने 1994 के लोकसभा उपचुनाव में किशोरी सिन्हा को वैशाली से मात दी. अगले ही साल विधानसभा चुनाव होने थे. लिहाजा अगड़ों में उम्मीद जगी. छोटन शुक्ला भी उसी रथ पर सवार हुए. लेकिन केसरिया में प्रचार से लौटते समय संजय सिनेमा के पास एक-47 से उनको भून दिया गया.. शक की सुई बृजबिहारी प्रसाद पर गई. इंतकाम के आग में छोटन का भाई भुटकुन शुक्ला ने ओंकार सिंह पर गोलियों की बैछार कर दी . फिर बदले की जिम्मेदारी छोटे भाई मुन्ना शुक्ला ने संभाली..

मुन्ना शुक्ला के लिए बृजबिहारी को निपटाना आसान नहीं था क्योंकि वो 1995 में चुनाव जीत मंत्री बन चुके थे. लेकिन भनक लग चुकी थी कि मुन्ना शुक्ला ने श्रीप्रकाश शुक्ला से संपर्क साधा है. लिहाजा सेक्युरिटी के मकसद से वो आईजीएमएस में भर्ती हो गए. लेकिन दारोगा के पिस्टल से दारोगा को भून डालने वाले श्रीप्रकाश की आंखों में खून सवार हो चुका था. और उसने इसे अंजाम भी दे दिया. श्रीप्रकाश तो एसीटएफ के एनकाउंटर में गाजियाबाद के पास ढेर हो गया. लेकिन तब जो खून के छींटे उड़े थे वो अब भी बिहार की राजनीति को प्रभावित करते हैं. मुन्ना शुक्ला इसी मर्डर केस में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं. पत्नी अन्नू शुक्ला फिर विधानसभा चुनाव में लालगंज से दांव लगा सकती हैं.

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