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बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए ताबड़तोड़ योजनाओं की घोषणाएं की हैं। यह रणनीति भाजपा और राजग द्वारा अन्य राज्यों में अपनाई गई सफल चुनावी रणनीति से मिलती-जुलती है, जहां महिला मतदाताओं ने चुनाव परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डाला है। नीतीश कुमार, जो लंबे समय से महिला मतदाताओं को अपना मजबूत वोट बैंक मानते आए हैं, उन्होंने पिछले तीन महीनों में इस वर्ग के लिए कई बड़े और महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं।
24 जून को, बिहार कैबिनेट ने वृद्धों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए मासिक पेंशन को 400 रुपये से बढ़ाकर 1,100 रुपये करने की मंजूरी दी। इस बढ़ी हुई पेंशन की पहली किस्त, जिसमें कुल 1,227 करोड़ रुपये से अधिक की राशि शामिल थी, 11 जुलाई को सीधे 1.11 करोड़ से अधिक लाभार्थियों के खातों में वितरित की गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन लाभार्थियों में से लगभग 54.5% महिलाएं हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस योजना का सीधा लाभ महिला मतदाताओं को मिल रहा है।
इसके बाद, 8 जुलाई को, बिहार कैबिनेट ने राज्य सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए मौजूदा 35% आरक्षण पर एक अधिवास (domicile) की शर्त लगाई। इस नए नियम के अनुसार, अब केवल बिहार की निवासी महिलाएं ही इस आरक्षण का लाभ उठा सकेंगी, जबकि अन्य राज्यों की महिलाएं सामान्य श्रेणी के तहत प्रतिस्पर्धा करेंगी। इस कदम को स्थानीय महिलाओं के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। 30 जुलाई को, सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं के मासिक मानदेय को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये कर दिया और ममता (मातृ स्वास्थ्य) कार्यकर्ताओं के लिए प्रति बच्चे के जन्म पर प्रोत्साहन राशि को 300 रुपये से बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया।
इन सभी घोषणाओं में सबसे महत्वपूर्ण फैसला 29 अगस्त को लिया गया, जब कैबिनेट ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना को मंजूरी दी, जिसके लिए 20,000 करोड़ रुपये का विशाल आवंटन किया गया है। 2 सितंबर को एक कैबिनेट बैठक में इस योजना की घोषणा की गई। इस योजना के तहत, हर परिवार की एक महिला को अपनी पसंद का रोजगार शुरू करने के लिए 10,000 रुपये का प्रारंभिक अनुदान मिलेगा। यदि लाभार्थी का व्यवसाय छह महीने बाद सफलतापूर्वक चल रहा है, तो वह उसे बढ़ाने के लिए 2 लाख रुपये तक का अतिरिक्त अनुदान प्राप्त कर सकती है। अधिकारियों ने बताया है कि पहली किस्त सितंबर में ही वितरित कर दी जाएगी।
सरकार महिलाओं द्वारा निर्मित उत्पादों को बेचने के लिए स्थानीय “हाट बाजार” या छोटे बाजार भी विकसित करेगी। इस पूरी योजना का बजट राज्य के आकस्मिक निधि से 20,000 करोड़ रुपये है। मुख्यमंत्री का दावा है कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं का व्यापक सशक्तिकरण करना है और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करके पलायन को रोकना है।
ये सभी कदम आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बेहद महत्वपूर्ण हैं। नीतीश कुमार की यह रणनीति विपक्षी दलों को एक बड़ा झटका दे सकती है, क्योंकि महिला मतदाता बिहार में एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरी हैं। इन योजनाओं के माध्यम से, नीतीश कुमार सीधे तौर पर महिला मतदाताओं को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी सरकार उनके सशक्तिकरण और कल्याण के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।