गोपालगंज: आपातकाल का दंश और कांग्रेस का पतन, 1971 के बाद से क्यों खत्म हुआ ‘गढ़’ का दबदबा?

Ritu Raj

सिटी पोस्ट लाइव
बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, गोपालगंज सीट का राजनीतिक इतिहास एक दिलचस्प कहानी कहता है। यह सीट कभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अभेद्य किला मानी जाती थी, लेकिन 1971 के बाद से इस ‘गढ़’ पर लगा ग्रहण आज तक नहीं हटा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि आपातकाल (इमरजेंसी) के बाद हुए 1977 के चुनाव ने इस सीट पर कांग्रेस के वर्चस्व को ऐसा झटका दिया, जिससे पार्टी आज तक उबर नहीं पाई है।

इमरजेंसी के बाद टूटा मिथक
आपातकाल से पहले, गोपालगंज विधानसभा सीट पर कांग्रेस का निरंतर प्रभुत्व था। 1971 के चुनाव में, कांग्रेस की रामदुलारी सिन्हा ने संगठन कांग्रेस के उम्मीदवार नागेश्वर सिंह को हराकर जीत दर्ज की थी। लेकिन यह कांग्रेस के लिए इस सीट पर आखिरी जीत साबित हुई।

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वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में, जनता पार्टी की उम्मीदवार राधिका देवी ने कांग्रेस के गढ़ होने के इस मिथक को तोड़ दिया। उन्होंने इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार काली प्रसाद पाण्डेय को हराकर जीत दर्ज की। इस हार के बाद कांग्रेस लगातार प्रयास के बावजूद यहां जीत दर्ज नहीं कर पाई है। 1980 के चुनाव में भी कांग्रेस को दूसरा स्थान मिला, और हद तो तब हो गई जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में भी 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस गोपालगंज सीट पर तीसरे स्थान पर सिमट गई थी। 1995 के चुनाव में भले ही कांग्रेस दूसरे स्थान पर आई, लेकिन जीत हमेशा दूर रही।

आजादी के बाद का कांग्रेस का प्रभुत्व
आजादी के बाद शुरुआती चुनावों में गोपालगंज सीट पर कांग्रेस का दबदबा साफ दिखाई देता था:

1952 और 1957: कमला राय (कांग्रेस) विजयी रहे।

1961 (मध्यावधि): सत्येंद्र नारायण सिन्हा (कांग्रेस) विजयी रहे।

1962: अब्दुल गफूर (कांग्रेस) विजयी रहे।

1969 और 1971: रामदुलारी सिन्हा (कांग्रेस) विजयी रहीं।

केवल 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के हरिशंकर सिंह ने कांग्रेस की जीत की इस श्रृंखला को तोड़ा था।

सुबास सिंह: गोपालगंज के नए किंगमेकर
गोपालगंज सीट के इतिहास में सबसे ज्यादा जीत दर्ज करने का रिकॉर्ड अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सुबास सिंह के नाम दर्ज है। लालू प्रसाद यादव के पैतृक जिले गोपालगंज में नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का खाता खुला। भाजपा ने सुबास सिंह को टिकट दिया और उन्होंने रेयाजुल हक राजू को हराकर पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने लगातार चार बार (नवंबर 2005, 2010, 2015 और 2020) जीत दर्ज की, जिससे यह सीट भाजपा का मजबूत गढ़ बन गई।

2022 में सुबास सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी कुसुम देवी ने जीत दर्ज कर इस सीट पर भाजपा का वर्चस्व बरकरार रखा है। सुबास सिंह के अलावा, कांग्रेस के कमला राय और रामदुलारी सिन्हा (दोनों दो-दो बार) तथा सुरेंद्र सिंह (दो बार) ही इस सीट से एक से अधिक बार विधायक रहे हैं।

आज गोपालगंज सीट पर कांग्रेस की पिछली जीत को आधे से अधिक सदी बीत चुकी है, जो दर्शाती है कि आपातकाल के बाद बिहार की राजनीति में आए मूलभूत बदलावों ने कैसे एक मजबूत राजनीतिक पार्टी के गढ़ को समाप्त कर दिया।

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