सहरी, इफ्तार और तरावीह: आखिर क्यों खास हैं रमजान के ये तीन पड़ाव? जानिए इनका गहरा अर्थ…

Ritu Raj

रमजान के मुकद्दस महीने की आमद के साथ ही फिजाओं में इबादत और रूहानियत की खुशबू घुल गई है। यह महीना केवल खाने-पीने के संयम का नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और खुदा से लौ लगाने का नाम है। इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना ‘रमजान-उल-मुबारक’ अपनी बरकतों के साथ दस्तक दे चुका है। यह वह दौर है जब दुनिया भर के मुसलमान अपनी व्यस्त जिंदगी से वक्त निकालकर खुद को खुदा की बंदगी और इंसानियत की सेवा में समर्पित कर देते हैं।

रमजान की अहमियत:
रमजान को सबसे पवित्र महीना इसलिए माना जाता है क्योंकि इसी महीने में अल्लाह की आख़िरी किताब ‘कुरआन शरीफ’ का नाजिल (अवतरण) होना शुरू हुआ था। इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में से एक ‘रोजा’ इसी महीने में रखा जाता है। रोजे का असल मकसद शरीर के साथ-साथ अपनी सोच, ज़बान और व्यवहार को भी पाक-साफ रखना है।

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सहरी:
सूरज निकलने से पहले किए जाने वाले भोजन को सहरी कहा जाता है। इसे ‘सुन्नत’ माना जाता है, क्योंकि पैगंबर मोहम्मद (स.) खुद सहरी किया करते थे। फज्र (सुबह) की अजान से पहले खाना-पीना खत्म कर लिया जाता है। यह भोजन पूरे दिन के रोजे के लिए शरीर को ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है।

इफ्तार:
मगरिब (सूर्यास्त) के वक्त जब रोजा खोला जाता है, तो उसे इफ्तार कहते हैं। खजूर और सादे पानी से रोजा खोलना पैगंबर साहब की सुन्नत है। इफ्तार केवल पेट भरने का नाम नहीं, बल्कि यह आपसी मोहब्बत और बराबरी का प्रतीक है। मस्जिदों और दस्तरखानों पर अमीर और गरीब का एक साथ बैठकर भोजन करना समाज को एकता का संदेश देता है।

तरावीह:
रमजान की रातों को जो चीज सबसे अलग और रूहानी बनाती है, वह है तरावीह की नमाज। दरअसल, यह इशा (रात) की नमाज के बाद पढ़ी जाती है। इसमें पूरे महीने के दौरान मस्जिदों में हाफिज-ए-कुरआन द्वारा मुकम्मल कुरआन सुनाया जाता है। हालांकि, यह नमाज ‘सुन्नत-ए-मुअक्कदा’ है। इसे पढ़ने पर बेहद सवाब (पुण्य) मिलता है। यह मोमिनों को अल्लाह के कलाम (कुरआन) से जोड़े रखने का एक बेहतरीन जरिया है।

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